आचार्य शांतिसागर छाणी समाधि स्थली के जीर्णोद्धार का शुभारंभ


भूमि पूजन समारोह श्रद्धा एवं भक्ति के साथ सागवाड़ा में सम्पन्न

चार माह में जीर्णोद्धार कार्य पूर्ण करने का लिया गया संकल्प

सागवाड़ा | 1 जुलाई 2026

दिगम्बर जैन परम्परा के महान तपस्वी प्रशम मूर्ति आचार्य शांतिसागर छाणी महाराज की पावन समाधि स्थली के जीर्णोद्धार कार्य का शुभारंभ 1 जुलाई को सागवाड़ा स्थित छोटी नसिया परिसर में अत्यंत श्रद्धा, भक्ति एवं धार्मिक वातावरण में भूमि पूजन के साथ सम्पन्न हुआ।

इस ऐतिहासिक परियोजना की प्रेरणा भारत गौरव आर्यिका रत्न 105 श्री स्वस्ति भूषण माताजी से प्राप्त हुई। कार्यक्रम का मार्गदर्शन आचार्य पदारोहण शताब्दी वर्ष समिति के अध्यक्ष हसमुख जैन गांधी (इंदौर) ने किया।

शताब्दी वर्ष से पूर्व होगा जीर्णोद्धार पूर्ण

समिति अध्यक्ष हसमुख जैन गांधी ने बताया कि आचार्य शांतिसागर जी महाराज के आचार्य पदारोहण शताब्दी वर्ष के औपचारिक शुभारंभ से पूर्व ही समाधि स्थल के संपूर्ण जीर्णोद्धार का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। उन्होंने कहा कि आगामी एक वर्ष तक देशभर में शताब्दी वर्ष के विविध कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे, जिनके माध्यम से आचार्य श्री के तप, त्याग, संयम एवं आदर्शों का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाएगा।

उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि जीर्णोद्धार के पश्चात यह पवित्र स्थल देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक प्रेरणादायी आध्यात्मिक केन्द्र के रूप में विकसित होगा।

विश्वस्तरीय स्वरूप प्रदान करने का लक्ष्य

राजस्थान सरकार के पूर्व राज्य मंत्री एवं समाज के वरिष्ठ नेता दिनेश खोड़निया ने अपने उद्बोधन में कहा कि सागवाड़ा का यह स्थान जैन समाज की अमूल्य आध्यात्मिक धरोहर है। आचार्य शांतिसागर जी महाराज ने यहीं मुनि दीक्षा ग्रहण की, दो चातुर्मास किए तथा यहीं समाधि प्राप्त की। इसलिए इस ऐतिहासिक स्थल का संरक्षण सम्पूर्ण समाज का दायित्व है।

समिति के महामंत्री ज्ञानेंद्र जैन (जहाजपुर) ने घोषणा की कि इस महत्त्वपूर्ण कार्य में धन की कोई कमी नहीं आने दी जाएगी तथा सागवाड़ा समाज के सहयोग से इसे सर्वोत्तम स्वरूप प्रदान किया जाएगा।

उत्तर भारत में दिगम्बर जैन परम्परा के पुनर्जागरण के महानायक

राजेन्द्र जैन महावीर ने कहा कि आचार्य शांतिसागर जी महाराज उत्तर भारत में दिगम्बर जैन परम्परा के पुनर्जागरण के महानायक थे। सागवाड़ा से उनका विशेष संबंध इस नगर एवं समाज के लिए गौरव का विषय है। उनका जीवन आज भी त्याग, तप, साधना और धर्मनिष्ठा का प्रेरणास्रोत बना हुआ है।

शताब्दी वर्ष समारोह समिति के मंत्री शरद पानोत ने भी अपने विचार व्यक्त किए। समाज के वरिष्ठजनों ने समाधि स्थल को भव्य स्वरूप देने तथा गुरु मंदिर निर्माण से संबंधित महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए। साधना कोठारी एवं महेश नोगामिया ने भी अपने विचार रखे।

कार्यक्रम का संचालन दिनेश खोड़निया ने किया।

सागवाड़ा से प्रारम्भ हुई गौरवशाली तप परम्परा

आचार्य शांतिसागर छाणी जी महाराज ने वर्ष 1923 में सागवाड़ा की पावन भूमि पर मुनि दीक्षा ग्रहण की थी। वर्ष 1926 में बिहार के गिरिडीह में आयोजित चातुर्मास के दौरान उन्हें आचार्य पद से विभूषित किया गया। उन्होंने दिगम्बर जैन परम्परा के पुनर्जागरण में ऐतिहासिक भूमिका निभाई।

आज उनकी शिष्य-प्रशिष्य परम्परा में 225 से अधिक दिगम्बर जैन संत एवं साध्वियाँ देश-विदेश में जैन धर्म, तप, संयम, अहिंसा एवं आध्यात्मिक मूल्यों का संदेश जन-जन तक पहुँचा रहे हैं। इसी गौरवशाली विरासत के सम्मान एवं संरक्षण के उद्देश्य से सागवाड़ा स्थित समाधि स्थली का भव्य जीर्णोद्धार किया जा रहा है।

समाज का व्यापक सहयोग

समारोह में श्री समाज सागवाड़ा, दशा हूमड़ दिगम्बर जैन समाज, आचार्य शांतिसागर जी स्मारक स्थली समिति तथा पंच महाजन के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे।

कार्यक्रम में प्रमुख रूप से महेश नोगामिया, आदिश खोड़निया, अश्विन बोवड़ा, संतोष खोड़निया, रितेश कोठारी, राजेन्द्र पंचोली, दिनेश मेहता, नटवरलाल मुंशी, राजमल शाह, कन्हैयालाल मेहता, नरेंद्र खोड़निया, कीर्ति शाह, डॉ. राजकुमार, विजयकुमार जैन, डॉ. राजकुमार दोसी, वनिता शाह, हिरेन खोड़निया, अमित खोड़निया, निकुंज वरवारिया, चिराग बोवड़ा, अनिरुद्ध शाह, विनय सेठ, मितेश शाह, हितेन्द्र सारगिया, दिलीप जैन, हेमंत शाह, कान्तिलाल बोवड़ा, पंडित जनक जैन, हेमंत मेहता, महावीर प्रसाद जैन, लक्ष्मीलाल टोंग्या, देवीलाल जैन जमौली, शरद पानोत, राजेन्द्र जैन महावीर, रजनीश जैन सहित अनेक श्रद्धालु उपस्थित रहे।

मंगलकामनाओं के साथ सम्पन्न हुआ समारोह

समारोह के अंत में उपस्थित सभी श्रद्धालुओं ने आचार्य शांतिसागर छाणी जी महाराज के तप, त्याग एवं आध्यात्मिक अवदान का स्मरण करते हुए समाधि स्थली के शीघ्र एवं भव्य जीर्णोद्धार की मंगलकामना की तथा धर्म प्रभावना के संकल्प के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।


Mail to: Ahimsa Foundation 
www.jainsamaj.org
R020726

No comments:

Post a Comment